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गोपालदास नीरज का जीवन परिचय

“स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,

लूट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे,

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!”

 गोपालदास नीरज का जीवन परिचय-

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों,

मोती व्यर्थ बहाने वालों,

कुछ सपनों के मर जाने से,

जीवन नहीं मरा करता है।”

 जैसी शानदार कविता लिखने वाले महान हिंदी के साहित्यकार गोपाल दास नीरज जी के जीवन के बारे में जानने की उत्सुकता लगभग उस व्यक्ति के मन में बनी रहती है जिन्होंने उनकी लेखनी को एक बार पढ़ लिया है।तो दोस्तों आज हम अपनी इस लेख में गोपाल दास नीरज के जीवन से संबंधित वे तमाम बातें करने वाले हैं जिनमें से कुछ बातों को आप जानते होंगे लेकिन कुछ ऐसी बातें भी होंगे जिन्हें आप नहीं जानते होंगे। इसीलिए हमारे इस पोस्ट के साथ में आप अंत तक बनी रहिए और गोपालदास नीरज जी के बारे में वह हर जानकारी रखिए जिन्हें आपको जानना जरूरी है।

गोपालदास नीरज कौन थे? और उनका पूरा नाम क्या था?

गोपाल दास नीरज का पूरा नाम था गोपालदास सक्सेना है। वे हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार शिक्षक एवं कवि थे। जिन्होंने अपनी लिखने के दम पर न केवल साहित्य जगत में बल्कि फिल्मी जगत में भी उन्होंने खूब नाम कमाया। अपने नाम गोपालदास सक्सेना में बाद में उन्होंने तख़ल्लुस “नीरज” को जोड़ दिया जिसके बाद उनका नाम गोपालदास सक्सेना से गोपालदास “नीरज’’ हो गया।

गोपालदास नीरज का जन्म कहाँ हुआ था?

 गोपाल दास नीरज का जन्म 4 जनवरी सन् 1925 को ब्रिटिश काल के भारत में उत्तर प्रदेश के संयुक्त प्रांत आगरा व अवध के इटावा जिले के पुरावली गाँव में हुआ था।

गोपालदास नीरज का पारिवारिक जीवन – इनके पिता का नाम बाबू ब्रजकिशोर सक्सेना था जिनकी मृत्यु जब गोपाल दास नीरज महज 6 साल के थे तभी हो गई थी। इसके बाद इन्हें उनके रिश्तेदारों ने पाला। लेकिन हाई स्कूल की परीक्षा पास करते हीं उनके रिश्तेदारों ने भी इनकी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया और कहा कि तुम अपनी देखभाल स्वयं करो। गोपाल दास नीरज जी की जिंदगी काफी संघर्ष में रही।

गोपालदास नीरज की शिक्षा-

 गोपाल दास नीरज की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। इसके बाद सन् 1942 में एटा से हाई स्कूल में प्रथम श्रेणी में परीक्षा पास की। आगे की शिक्षा के लिए पर्याप्त पैसे ना होने के कारण इन्हें छोटी मोटी कई प्रकार की नौकरियां भी करनी पड़ी इटावा में कचहरी में टाइपिस्ट का काम करना। वहां से नौकरी छूटने के बाद सिनेमा घर की दुकान पर नौकरी करना। इसके बाद कानपुर के डी.ए.वी कॉलेज में क्लर्क पद पर नौकरी करके इन्होंने अपना गुजर बसर किया और फिर एक बाल्कट ब्रदर्स नाम की प्राइवेट कंपनी में लगभग 5 साल तक टाइपिस्ट की करने के बाद इन्होंने सन 1949 में अपनी इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की और फिर सन 1951 में इन्होंने अपना ग्रेजुएशन कंप्लीट किया और इसी तरह सन 1953 में प्रथम श्रेणी में इन्होंने हिंदी साहित्य से M.A की परीक्षा पास की।

गोपालदास नीरज का फिल्मी सफर –

 मेरठ की कॉलेज में यह हिंदी अध्यापक के तौर पर कार्य कर रहे थे लेकिन वहां प्रशासन द्वारा उनके ऊपर कक्षा में पढ़ने की जगह रोमांस करने का घोर अपराध लगने के कारण यह काफी क्रोधित हो गए और नौकरी छोड़कर इन्होंने अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज विभाग में प्राध्यापक पद पर कार्य करना शुरू किया। कविताओं में रुचि होने के कारण गोपाल दास नीरज जी अक्सर कवि सम्मेलनों में जाया करते थे जहां उनकी धीरे-धीरे प्रसिद्ध बढ़ने लगी और इसी को देखते हुए इन पर नजर पड़ी एक दिन देवानंद साहब की जिन्होंने इन्हें मुंबई आने का आग्रह किया। रंगीला रे फिल्म के लिए उन्हें रंगीला शब्द से शुरू होने वाले गाने का आग्रह किया गया था जिस पर वे बिल्कुल खरे उतरे और उन्होंने “रंगीला रे” गाना लिखायहां आने पर उनका पहला गाना मोहम्मद साहब ने गया था। फिल्मी गीतों के लिए मुंबई आकर गोपाल दास नीरज जी की कविताएं गीतों में बदल गई और उन्होंने फिल्मों के लिए कई प्रसिद्ध गीत लिखे जिनमें से मेरा नाम जोकर, प्रेम पुजारी,शर्मीली और “ लिखे जो खत तुझे” “कारवां गुजर गया गुब्बार देखते रहे” जैसी कई सारे गीत लिखकर वह फिल्मी जगत के लिए अमर हो गए। लेकिन उनका मन अधिक समय तक मुंबई में लगा नहीं इसके बाद में पुनः अलीगढ़ वापस आ गए और अपने अंतिम समय तक वें यहीं रहें।

गोपालदास नीरज की कविताएँ व गीत संग्रह-

गोपाल दास नीरज साहब ने अपने जीवन काल में तमाम शायरी, ग़ज़लें और गीत लिखे हैं। जिनमें से –

संघर्ष,

कारवाँ गुजर गया,

नदी किनारे,

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों,

तुम्हारे लिए,

नीरज की गीतिकाएँ (1987)

नीरज की पाती,

दर्द दिया है।

 जैसे कई सारी कविता संग्रह हुआ गीत उन्होंने लिखिए।

गोपाल दास नीरज की प्रसिद्ध कविता- वैसे तो गोपाल दास नीरज जी की बहुत सारी ऐसी कविताएं हैं जिसे कई बार पढ़ने पर भी मन भरता नहीं है लेकिन उनकी दो यह मशहूर कविताएं जिन्हें हमने बार-बार पढ़ा है।

1- छिप-छिप अश्रु बहाने वालों

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है,नयन सेज पर सोया हुआ आंख का पानी,

और टूटना है उसका ज्यों,जागे कच्ची नींद जवानी,

गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों,

कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गई तो क्या है?खुद ही हल हो गई समस्या, आंसू गर नीलाम हुए तो,समझो पूरी हुई तपस्या।

रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों,

कुछ दीपों के बुझ जाने से, आंगन नहीं मरा करता है।

खोता कुछ भी नहीं यहां पर,केवल जिल्द बदलती पोथी,

जैसे रात उतार चांदनी,पहने सुबह धूप की धोती,

वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों! चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियां फूटीं, शिकन न आई पनघट पर, लाखों बार किश्तियां डूबीं, चहल-पहल वो ही है तट पर,

तम की उमर बढ़ाने वालों! लौ की आयु घटाने वालों! लाख करे पतझर कोशिश पर,उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन, लुटी न लेकिन गंध फूल की, तूफानों तक ने छेड़ा पर, खिड़की बन्द न हुई धूल की,

नफ़रत गले लगाने वालों! सब पर धूल उड़ाने वालों! कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पण नहीं मरा करता है!

2-

कारवां गुज़र गया

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,

लूट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से,

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे,

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,

पांव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,

पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई,

चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,

गीत अश्क़ बन गए, छंद हो दफ़न गए,

साथ के सभी दीये धुआं-धुआं पहन गए,

और हम झुके-झुके, मोड़ पर रुके-रुके

उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे,

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,

क्या सुरूप था कि देख आईना मचल उठा,

इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,

थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,

एक दिन मगर यहां, ऐसी कुछ हवा चली,

लूट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली,

और हम लुटे-लुटे, वक्त से पिटे-पिटे,

सांस की शराब का खुमार देखते रहे,

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चांद की संवार दूं,

होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूं,

दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूं,

और सांस यूं कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूं,

हो सका न कुछ मगर, शाम बन गई सहर,

वह उठी लहर कि दह गए किले बिखर-बिखर,

और हम डरे-डरे, नीर नयन में भरे,

ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे,

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

मांग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,

ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,

शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,

गांव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,

पर तभी ज़हर भरी, ग़ाज एक वह गिरी,

पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चुनरी,

और हम अजान से, दूर के मकान से,

पालकी लिए हुए कहार देखते रहे।

कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

गोपालदास नीरज की मृत्यु कब हुई?

हिंदी साहित्य,कविता जगत व फिल्म जगत में अपनी रचनाओं व स्वर्णिम शब्दों से अमर होने वाले इस महान साहित्यकार गोपालदास नीरज की मृत्यु सन् 2018 में 19 जुलाई को दिल्ली के एम्स हॉस्पिटल में हो गई और यह सूरज हमेशा के लिए अस्त हो गया।

गोपालदास नीरज को मिलने वाले सम्मान –

 गोपाल दास नीरज ऐसे पहले व्यक्ति रहे हैं जिन्हें भारत सरकार द्वारा शिक्षा और साहित्य की क्षेत्र में दो बार राष्ट्र द्वारा दिए जाने वाले पदम् श्री (1991) व उसके बाद पदम् भूषण(2007)  देकर उन्हें सम्मान दिया गया। और साथ ही उन्हें यश भारती एवं ₹100000 का पुरस्कार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सन् 1994 में दिया गया। गोपाल दास नीरज जी ने उर्दू भाषा के लिए भी बहुत कार्य किया था इसीलिए उन्हें विश्व उर्दू परिषद पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

 दोस्तों हमें आशा है कि आपको गोपाल दास नीरज से संबंधित भी तमाम जानकारियां हमारे इस लेख में मिली है जिन्हें आप जानना चाहते थे। ऐसी ही और कई सारी जानकारियां प्राप्त करने के लिए आप हमारे दूसरे ब्लॉग्स भी पढ़ सकते हैं।

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