भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार
दोस्तों आज हम आपके सामने भारत के साहित्य में अपना पैर जमाने वाले कुछ मुख्य कवियों के नाम बताने वाले हैं जिनके बारे में कुछ चर्चाएं करेंगे जिनसे शायद आप अब तक अवगत नहीं थे। आइये जानते हैं हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार और उनकी रचनाएँ:
सुमित्रानंदन पंत

उत्तराखंड के गांव में जन्मे सुमित्रानंदन पंत का जन्म सन 1900 में 20 मई को कौसानी नामक गांव में हुआ था। इनका पहला नाम गोसाई दत्त था जिसे इन्होंने बदलकर सुमित्रानंदन पंत करवा लिया अपने हाई स्कूल में। सुमित्रानंदन पंत को पद्म भूषण, ज्ञानपीठ पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कारों से नवाजा गया है। उनकी मृत्यु 20 दिसंबर 1977 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुई थी। सुमित्रानंदन पंत सुकुमार कवि के रूप से जाने जाने वाले कवियों में से एक है। इन्होंने आजीवन शादी नहीं की। शादी नहीं की इसलिए नहीं कि इनका मन नहीं था बल्कि इसलिए की इन्हें मौका ही नहीं मिल पाया। इनका विचार था कि यह लड़की पसंद करके खुद से शादी करेंगे लेकिन यह जिस समय के हैं उस समय लड़कियां कभी भी लड़कों के सामने आती नहीं थी। सुमित्रानंदन पंत जी का मानना है की लड़कियों को गांव समाज में हक दिलाने वाले महात्मा गांधी जी थे जिनकी बदौलत लड़कियां घरों से बाहर निकलना शुरू की।ये अपने पहनावे को लेकर बेहद ही संवेदनशील रहते थे। उनकी कविताओं में स्त्रियों के प्रति सम्मान साफ़-साफ़ दिखाइ देता है। उनकी एक रचना इस प्रकार से है कि –
जीना अपने में ही एक महान कर्म है
जीने का हो सदुपयोग यह मनुज धर्म है
अपने ही में रहना एक प्रबुद्ध कला है।
जग के हिट रहने में सब का सहज भला है
जग का प्यार मिले जन्मों के पूर्ण चाहिए
जगजीवन को प्रेम सिंधु में डूब चाहिए।
महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा सरस्वती माता का प्रतीक माने जाने वाली और आधुनिक युग की मीरा कहीं जाने वाली पर रुख बाद में सन 1907 में होली के दिन हुआ था। उन्होंने संस्कृत विषय से प्रयागराज विश्वविद्यालय से M.A किया था। बचपन से ही चित्रकला, संगीत और काव्य लिखने में इनका काफी रुचि होती थी। जिस कारण से इन्होंने 7 साल की उम्र में ही कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। इसके बाद मात्र 9 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई थी लेकिन उन्हें शादी ब्याह में किसी भी प्रकार का शौक नहीं था। यह बौद्ध भिक्षुका बनना चाहती थी। जिस कारण से ब्याहता होते हुए भी इन्होंने कभी भी अपने पति को स्वीकार नहीं किया। और उनके पति ने भी इनके भाव का सम्मान रखा। इलाहाबाद में रहते हुए यह आजीवन साहित्य को अपना जीवन देती रहीं। यह काफी कम उम्र में ही कवि सम्मेलनों में जाने लगी थी जिस दौरान इन्हें एक चांदी का कटोरा भी मिला था जिसे उन्होंने गांधी जी को दे दिया था। महादेवी वर्मा का चरित्र हमें बहुत कुछ सीखाता है।
इनकी कविताएं प्रकृति को आधार बनाते हुए नारीत्व जीवन का प्रतीक बनती है जैसे में –
मैं नीर भरी दुख की बदली,
विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमरी कल थी मिटा आज चली।
रामधारी सिंह दिनकर

रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 में बिहार के बेगूसराय जिला में सिमरिया नामक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रवि सिंह था और माता जी का नाम श्रीमती मंजू देवी था।छायावाद कवियों में रामधारी सिंह दिनकर जी का नाम बड़े ही आदर के साथ दिया जाता है। इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि दी गई है। रामधारी सिंह की कविताओं में जो जोश था वह सराहनीय है। जोकि जवानों के रगों में जोश भर देता था जो उर्वशी और रश्मिरथी जैसी रचनाएं मौजूद है। रश्मिरथी उनका महाकाव्य है जिसकी कुछ पंक्तियां हम यहां रखना चाहते हैं-
मैत्री की राह बताने को
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान हस्तिनापुर आए
पांडव का संदेशा लाये।
कांग्रेसी सत्ता में रहते हुए की रामधारी सिंह दिनकर जी जो कि कांग्रेस के सदस्य थे लेकिन सरकार की मनमानियां देखते हुए उन्होंने जनता के तरफ से अपनी एक कविता लिखी जिसे हमने आपको यहां बताया है-
सदियों की ठंठी बुझी राख़ सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,
दो राह समय के रथ का घरघर नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
जैसी कविताएं युवाओं की जुबान दोहराने लगी थी। इस कविता ने उसे समय युवाओं में सरकार के प्रति अपने हक की बात करने के लिए जोश भर दिया था। इस प्रकार से रामधारी सिंह दिनकर जी पूरे भारतवर्ष में राष्ट्रकवि के नाम से जानें जाने लगे।
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मैथिलीशरण गुप्त

मैथिली शरण गुप्त राष्ट्रकवि के नाम से जाने जाने वाले कवियों में से एक। इनका जन्म 3 अगस्त 1886 को हुआ था और मृत्यु 12 दिसंबर 1964 को। मैथिली शरण गुप्त इतिहास में खड़ी बोली के प्रथम कवियों में से एक है। साहित्य जगत में इनका इतना अधिक योगदान है कि साहित्यकारों द्वारा इन्हें “दादा, नाम से संबोधित किया जाता था। मैथिली शरण गुप्त की रचनाओं में अनेकों रचनाएं हैं लेकिन साकेत, महाकाव्य लिखकर दिनकर काव्य जगत में अमर हो गए। जिनकी कुछ पंक्तियां हम आपके यहां बताने जा रहे हैं-
चल चपल कलम, निज चित्रकूट चल देखें,
प्रभु चरण चिन्ह पर सफल भाल लिपि लेखें,
संप्रति साकेत समाज वही है सारा,
सर्वत्र हमारे संग स्वदेश हमारा।
रोक कर रज में लोटो न भारत ओ आओ,
यह छाती ठंडी करो सुमुख सुखदायी,
आंखों के मोति यों न बिखर आओ,
उपहार रूप यह हार मुझे पहनाओ।
सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

सन 1899 में महिषादल राज्य के बंगाल में जन्मे सुमित्रानंदन पंत एक बेहद ही प्रतिभाशाली कवियों में से एक थें । उनके बचपन का नाम सूर्य कुमार था। उनके पिता का नाम राम सहाय त्रिपाठी था। उनकी पत्नी मनोरमा देवी और पुत्री सरोज थी। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी छायावाद के कवियों में एक अलग ही पहचान बनाए हुए हैं। जिन्होंने स्वच्छंद कविताएं लिखी। निराला जी बेहद ही निराले स्वभाव के थे। जिन्हें दूसरों की गरीबी बर्दाश्त नहीं होती थी। और यह काफी भोले और सरल इंसान थे। प्रयागराज में निराला जी और महादेवी वर्मा आसपास ही रहा करते थे। निराला जी ने महादेवी वर्मा को अपनी बड़ी बहन माना था। एक कहानी के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि निराला जी जो भी पैसे कमाते थे मिला करके महादेवी वर्मा जी को दे दिया करते थे जिससे कि उन्हें जब भी काम लगे वह जाकर महादेवी वर्मा से मांग कर अपना काम चला सकें।क्योंकि अगर उनके हाथ में रहता था पैसा तो वें हमेशा खर्च कर दिया करते थे। कारण यह था कि उन्हें दूसरों की गरीबी बर्दाश्त नहीं होती थी। एक बार की बात है जब उन्हें अपने महीने के अंत में कुछ पैसे बचा कर रखते थे ताकि वह अपने आगे के खर्चे उठा सके। तब एक दिन उनके सामने एक बेहद ही गरीब इंसान आ गया जो की ठंड में एकदम से ठिठुर गया था और उसे पहनने के लिए कपड़े नहीं थे तो निराला जी ने अपना गद्दा उन्हें दे दिया और अपने हिस्से का पैसा मांग कर महादेवी वर्मा से दे दिया कि जाकर कुछ खा लेना। उनके इसी स्वभाव पर महादेवी वर्मा उन्हें बेहद ही भोला समझती थी। निराला जी खुद से ज्यादा दूसरों की परवाह करते थे। उनकी कविताएं तो अनेक है लेकिन जब उनकी बेटी सरोज मर गई तब की कविता और वह तोड़ती पत्थर जिसे ऊंचे ऊंचे महलों में रहने वाले उद्योगपतियों के खिलाफ निराला जी ने लिखा था यह पढ़ने योग्य है। जो कि इस प्रकार से है –
वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर।
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार
श्याम तन,भर बंधा यौवन
नत नयन, प्रिय –कर्म –रत मन,
गुरु हथोड़ा हाथ
करती बार–बार प्रहार
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।
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सुभद्रा कुमारी चौहान

भारत के इतिहास में सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता झांसी की रानी को भला कौन नहीं जानता होगा। इस कविता से सुभद्रा कुमारी चौहान पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गइं। सुभद्रा कुमारी का जन्म 16 अगस्त 1904 को हुआ था। यह हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवित्रियों में से एक थी। इनका राष्ट्र प्रेम उनकी कविताओं में साफ-साफ चलता है। इनके इसी राष्ट्र प्रेम के बदौलत सन 2007 में 24 अप्रैल को सम्मानित करने के लिए सरकार द्वारा एक तटरक्षक जहाज को सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम दिया है।सुभद्रा कुमारी चौहान की मृत्यु एक मोटर एक्सीडेंट में हुई थी। लेकिन उनकी यह कविता उन्हें पूरे भारत वर्ष में करने के बाद भी अमर बना गयी –
चमक उठी सन सत्तावन में
वह तलवार पुरानी थी
बुंदेली हर बोल के मुख
हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झांसी वाली रानी थी।
तो दोस्तों हमें आशा है कि आपको हमारा यह लेख पसंद आया होगा ऐसे ही और लेखक के बारे में जानने के लिए आप हमारे दूसरे आर्टिकल्स को पढ़ सकते हैं।आपका बहुत-बहुत धन्यवाद…
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